नई दिल्ली | 20 सितंबर 2026: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU चुनाव एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे। 18 सितंबर को मतदान और 19 सितंबर को मतगणना के बाद तस्वीर साफ हो गई। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने चार केंद्रीय पदों में से तीन पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन विजयी रहे। इस बार चुनाव सिर्फ छात्र संगठनों की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहा; चुनावी खर्च की ₹5,000 सीमा, प्रचार नियमों के उल्लंघन, वाहनों के इस्तेमाल और दिल्ली हाई कोर्ट की सख्ती ने भी चुनाव को सुर्खियों में रखा।
DUSU की राजनीति का राष्ट्रीय राजनीति से पुराना संबंध है। दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्रसंघ 1947 में एक छोटे से प्रशासनिक अनुदान से शुरू हुआ था और समय के साथ देश के सबसे चर्चित छात्र प्रतिनिधि निकायों में शामिल हो गया। पिछले कई दशकों में इसके चुनावों में व्यापक राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठनों की सक्रियता बढ़ी है।
2026 के चुनाव में किसने क्या जीता?
19 सितंबर को घोषित परिणामों में ABVP के उम्मीदवारों ने तीन केंद्रीय पद हासिल किए।
- अध्यक्ष: यश डबास — ABVP
- उपाध्यक्ष: दीपांशु शौकीन — निर्दलीय
- सचिव: रिया छावड़ी — ABVP
- संयुक्त सचिव: लक्ष्य राज सिंह — ABVP
चार केंद्रीय पदों के लिए कुल 20 उम्मीदवार मैदान में थे और मतदान प्रतिशत 40.46% रहा। अध्यक्ष पद पर यश डबास ने NSUI के विजय शंकर मीणा को हराया।
उपाध्यक्ष पद का परिणाम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जहां निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की। इस तरह ABVP चारों केंद्रीय पदों पर कब्जा नहीं कर सकी।
DUSU सिर्फ कैंपस चुनाव क्यों नहीं माना जाता?
DUSU चुनाव लंबे समय से राष्ट्रीय छात्र राजनीति का महत्वपूर्ण मंच रहे हैं। ABVP, NSUI और वामपंथी छात्र संगठनों जैसे AISA और SFI से जुड़े समूह चुनाव में सक्रिय रहे हैं। 2026 में भी ABVP, कांग्रेस-समर्थित NSUI और AISA-SFI गठबंधन ने चार केंद्रीय पदों के लिए उम्मीदवार उतारे।
इतिहास बताता है कि DUSU से जुड़े कई छात्र नेता आगे चलकर सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए। इसी वजह से विश्वविद्यालय का यह चुनाव केवल कैंपस प्रतिनिधित्व का विषय नहीं रहता, बल्कि छात्र राजनीति और व्यापक राजनीतिक संगठनों के बीच संबंधों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बन जाता है।
हालांकि, यह कहना कि DUSU चुनाव “देश की मुख्यधारा की राजनीति की दिशा तय करते हैं”, तथ्य के रूप में सही नहीं होगा। अधिक सटीक बात यह है कि DUSU लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठनों के लिए महत्वपूर्ण चुनावी मंच रहा है।
Lyngdoh Committee के नियम: चुनाव खर्च की सीमा कितनी है?
DUSU चुनावों के लिए Lyngdoh Committee की सिफारिशों और विश्वविद्यालय के चुनावी नियमों का महत्वपूर्ण स्थान है।
2026 के आधिकारिक चुनावी दिशा-निर्देशों के अनुसार:
- उम्मीदवार की अधिकतम अनुमत चुनावी खर्च सीमा ₹5,000 थी।
- स्नातक उम्मीदवार की आयु 16 अगस्त को 17 से 22 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
- स्नातकोत्तर उम्मीदवार के लिए अधिकतम आयु 25 वर्ष थी।
- उम्मीदवार को विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित न्यूनतम attendance अथवा 75 प्रतिशत attendance, जो भी अधिक हो, पूरी करनी होती है।
- प्रचार के लिए printed posters और pamphlets प्रतिबंधित थे।
- handmade posters की अनुमति निर्धारित नियमों के तहत थी।
- loudspeakers और campaign vehicles के इस्तेमाल पर रोक थी।
- विश्वविद्यालय ने paperless campaigning को बढ़ावा दिया और उम्मीदवारों को वीडियो भाषण तथा सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के इस्तेमाल की अनुमति दी।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सुधारना जरूरी है। DUSU चुनावों में खर्च की सीमा ₹50,000 नहीं, बल्कि 2026 के लिए ₹5,000 थी। इसलिए चुनावी खर्च के संबंध में ₹50,000 का आंकड़ा प्रकाशित करना गलत होगा।
₹5,000 की सीमा और जमीन पर प्रचार का सवाल
कागज पर नियम काफी स्पष्ट थे, लेकिन 2026 के चुनाव अभियान के दौरान इन नियमों के पालन को लेकर सवाल उठे।
17 सितंबर की एक ground report में महंगी SUVs और Thar जैसी गाड़ियों के काफिलों तथा प्रचार सामग्री को लेकर ₹5,000 की सीमा के संदर्भ में सवाल उठाए गए।
18 सितंबर को मतदान के दिन PTI की रिपोर्ट में भी North Campus में printed pamphlets और vehicle rallies जैसी गतिविधियों का उल्लेख किया गया, जिन्हें चुनावी नियमों के संभावित उल्लंघन के रूप में देखा गया।
इससे DUSU चुनावों में एक पुराना सवाल फिर सामने आया—क्या कागज पर तय चुनावी नियम और जमीन पर होने वाला प्रचार एक-दूसरे के अनुरूप हैं?
इसका अंतिम उत्तर केवल किसी एक चुनावी तस्वीर या वीडियो से नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए उम्मीदवारों के वास्तविक खर्च, campaign accounts और विश्वविद्यालय की आधिकारिक जांच के निष्कर्षों को देखना जरूरी होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट की सख्ती ने बढ़ाई चुनाव की गंभीरता
2026 के DUSU चुनाव में न्यायिक हस्तक्षेप भी महत्वपूर्ण रहा।
दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव प्रचार के दौरान Lyngdoh Committee recommendations, model code of conduct और अदालत के पूर्व आदेशों के कथित उल्लंघनों को लेकर 140 छात्र उम्मीदवारों को नोटिस जारी किए। रिपोर्टों में luxury car cavalcades, हथियार लहराने और एक शिक्षक पर कथित हमले जैसी घटनाओं का भी उल्लेख हुआ।
अदालत ने परिणाम घोषित होने के बाद victory processions पर रोक लगा दी। यह कदम चुनावी प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था और नियमों के पालन को लेकर अदालत की चिंता को दिखाता है।
यहां यह distinction महत्वपूर्ण है कि अदालत द्वारा नोटिस जारी होना अपने आप में सभी संबंधित उम्मीदवारों को किसी अपराध का दोषी साबित नहीं करता। यह न्यायिक प्रक्रिया में उठाए गए गंभीर आरोपों और नियमों के संभावित उल्लंघनों पर कार्रवाई का हिस्सा है।
प्रचार, गाड़ियां और कैंपस का माहौल
DUSU चुनावों के दौरान North और South Campus में बड़े स्तर पर campaigning होती है। 2026 में vehicle rallies और printed campaign material को लेकर सामने आई रिपोर्टों ने यह सवाल उठाया कि विश्वविद्यालय के चुनावी नियमों को लागू करना कितना प्रभावी है।
दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही में भी luxury vehicles और campaign-related violations का मुद्दा सामने आया। इसका असर केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। बड़े वाहन काफिले, भीड़ और campaign activity campus तथा आसपास के traffic और public order पर भी दबाव डाल सकते हैं।
इसलिए DUSU चुनाव प्रशासन के सामने चुनौती केवल मतदान कराने की नहीं, बल्कि प्रचार, खर्च, सार्वजनिक स्थानों और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों को लागू कराने की भी है।
इस बार छात्रों के मुद्दे क्या रहे?
2026 के चुनाव अभियान में छात्र सुरक्षा, accommodation और campus facilities जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। खास तौर पर दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में एक पांच मंजिला इमारत के ढहने की घटना, जिसमें सात लोगों की मौत हुई थी, के बाद छात्र आवास और सुरक्षा का मुद्दा चुनावी बहस में प्रमुखता से आया।
इससे DUSU चुनाव की बहस केवल विचारधारा या संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रही। हॉस्टल, छात्र सुरक्षा, रहने की व्यवस्था और कैंपस सुविधाएं भी प्रमुख चुनावी मुद्दों के रूप में सामने आए।
यही वे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों के दैनिक जीवन से है।
सार्वजनिक संपत्ति और पोस्टर का सवाल
दिल्ली में सार्वजनिक और निजी संपत्तियों के defacement से संबंधित कानूनी प्रावधान भी मौजूद हैं। Delhi Prevention of Defacement of Property Act, 2007 सार्वजनिक संपत्ति को विरूपित करने वाली गतिविधियों पर कानूनी कार्रवाई का आधार प्रदान करता है।
DUSU चुनाव के संदर्भ में इसे सीधे हर campaign activity पर लागू होने वाला अलग “DUSU election law” समझना सही नहीं होगा। विश्वविद्यालय के अपने चुनावी नियम, Lyngdoh framework और अन्य लागू कानून अलग-अलग स्तरों पर भूमिका निभाते हैं।
2026 में printed posters और pamphlets पर विश्वविद्यालय की स्पष्ट रोक थी। इसके बावजूद मतदान के दौरान printed material मिलने की रिपोर्टें सामने आईं।
DUSU का इतिहास और राष्ट्रीय राजनीति से रिश्ता
DUSU की शुरुआत 1947 में एक छोटे प्रशासनिक अनुदान के प्रस्ताव से हुई थी। इसके बाद छात्र प्रतिनिधित्व की यह व्यवस्था धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक मंच में बदलती गई।
समय के साथ अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठनों ने इसमें अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। आज ABVP और NSUI जैसे संगठन इसके प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ी हैं, जबकि AISA और SFI जैसे वामपंथी संगठन भी चुनावी मुकाबले में हिस्सा लेते हैं।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण DUSU को भारतीय छात्र राजनीति और व्यापक राजनीतिक संगठनों के बीच संबंधों को समझने के लिए महत्वपूर्ण मंच माना जाता है।
आगे की चुनौती: नियम बनाना नहीं, उन्हें लागू करना
2026 के चुनाव ने एक बार फिर दिखाया कि DUSU चुनावों में नियमों की कमी से ज्यादा बड़ी चुनौती नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन की है।
एक ओर विश्वविद्यालय ने ₹5,000 की खर्च सीमा, paperless campaigning, printed posters पर रोक और vehicle तथा loudspeaker restrictions जैसे स्पष्ट नियम बनाए। दूसरी ओर चुनाव के दौरान इन नियमों के संभावित उल्लंघन को लेकर रिपोर्टें और न्यायिक हस्तक्षेप सामने आए।
भविष्य में चुनाव प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने के लिए तीन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है:
- उम्मीदवारों के campaign expenditure की अधिक पारदर्शी जांच;
- नियमों के उल्लंघन पर समयबद्ध कार्रवाई;
- digital campaigning और verified candidate information को बढ़ावा।
इससे छात्रों को उम्मीदवारों के विचार, घोषणापत्र और रिकॉर्ड की तुलना करने के लिए बेहतर जानकारी मिल सकती है।
DUSU Election 2026 ने एक साथ दो तस्वीरें सामने रखीं। एक तरफ यह दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी का बड़ा मंच बना रहा, तो दूसरी तरफ चुनावी खर्च, प्रचार के तौर-तरीकों, वाहनों और नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल भी उठे।
19 सितंबर के परिणाम में ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन के खाते में गया।
इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी केवल यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा। असली सवाल यह भी है कि क्या विश्वविद्यालय ऐसी छात्र राजनीति विकसित कर सकता है जिसमें चुनावी प्रतिस्पर्धा के साथ नियमों का पालन, छात्र सुरक्षा, पारदर्शिता और वास्तविक छात्र मुद्दे बराबर महत्व रखें?
2026 के चुनाव ने इस बहस को एक बार फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्र में ला दिया है।