DEAP ANALYZER NEWS NETWORK - WORLD WIDE | 19 सितंबर 2026
जब दुनिया सो रही होती है, तब किसी स्मार्टफोन पर आने वाला एक अदृश्य डिजिटल हमला उसके मालिक को कुछ भी असामान्य महसूस कराए बिना संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बना सकता है। न कोई संदिग्ध लिंक, न कोई फाइल डाउनलोड और कुछ मामलों में न ही उपयोगकर्ता की ओर से कोई क्लिक।
यह किसी हॉलीवुड फिल्म की कल्पना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में Pegasus जैसे commercial spyware ने यह दिखाया है कि अत्याधुनिक साइबर निगरानी तकनीक किस तरह स्मार्टफोन को ही निगरानी के एक शक्तिशाली माध्यम में बदल सकती है।
इज़राइल स्थित NSO Group का Pegasus इस क्षेत्र का सबसे चर्चित उदाहरण है। इसके अलावा Candiru और QuaDream जैसी कंपनियां भी commercial surveillance technology से जुड़ी रही हैं। इन तकनीकों को लेकर दुनिया भर में सरकारों, पत्रकारों, राजनीतिक व्यक्तियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के बीच गंभीर गोपनीयता एवं मानवाधिकार संबंधी चिंताएं सामने आई हैं। यूरोपीय संसद की PEGA समिति ने भी Pegasus और इसी प्रकार के spyware के दुरुपयोग की जांच की थी।
जीरो-क्लिक तकनीक: बिना क्लिक किए फोन में सेंध कैसे लग सकती है?
पारंपरिक phishing हमले में उपयोगकर्ता को किसी लिंक पर क्लिक करने या संदिग्ध फाइल खोलने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके विपरीत, कुछ अत्याधुनिक spyware attacks में zero-click exploits का इस्तेमाल किया गया है।
इस स्थिति में लक्ष्य व्यक्ति को कोई स्पष्ट कार्रवाई करने की आवश्यकता नहीं होती। किसी messaging application, operating system या अन्य software component में मौजूद security vulnerability का फायदा उठाकर हमलावर device compromise करने का प्रयास कर सकता है।
2019 में WhatsApp ने एक ऐसी vulnerability की पुष्टि की थी जिसका इस्तेमाल NSO Group के Pegasus से जुड़े हमलों में किया गया था। Amnesty International के अनुसार उस vulnerability के माध्यम से targeted devices को बिना सामान्य phishing interaction के compromise करने की कोशिश की गई थी।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि Pegasus का हर attack एक ही तकनीक पर आधारित नहीं रहा है। समय के साथ इसके infection methods और exploit chains में बदलाव हुए हैं।
फोन में प्रवेश के बाद क्या हो सकता है?
एक बार किसी device पर अत्याधुनिक spyware को पर्याप्त privileges मिल जाने के बाद उसकी क्षमताएं काफी व्यापक हो सकती हैं।
European Parliamentary Research Service के अनुसार Pegasus जैसे spyware का उद्देश्य मोबाइल फोन में प्रवेश करके वहां मौजूद या processed information तक पहुंच बनाना हो सकता है। इसमें text messages, calls, passwords, location information तथा microphone और camera से संबंधित data जैसी संवेदनशील जानकारी शामिल हो सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि spyware हर परिस्थिति में हर खाते या application का पूर्ण नियंत्रण स्वतः हासिल कर लेता है। वास्तविक क्षमता device, operating system, exploit और deployed spyware version पर निर्भर करती है।
एन्क्रिप्टेड चैट भी क्यों जोखिम में आ सकती है?
WhatsApp, Signal या अन्य applications में end-to-end encryption का उद्देश्य communication को रास्ते में intercept होने से सुरक्षित रखना है।
लेकिन यदि attacker स्वयं उस smartphone को compromise कर लेता है जिस पर संदेश पढ़े या लिखे जा रहे हैं, तो encryption को तोड़ना आवश्यक नहीं होता। Spyware device पर उस information तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है जिस समय वह उपयोगकर्ता के सामने उपलब्ध होती है।
इसी वजह से अत्याधुनिक spyware का खतरा केवल network interception तक सीमित नहीं है।
इज़राइल की Defense Export Control व्यवस्था
Pegasus और उससे जुड़े विवादों का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका regulatory framework भी है।
इज़राइल में Defense Export Controls Agency (DECA) रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है। इज़राइल के आधिकारिक विवरण के अनुसार DECA defense equipment, know-how और defense-related services के export controls को regulate करती है। इसकी व्यवस्था Defense Export Control Law, 2007 पर आधारित है।
DECA के घोषित guidelines में national security, foreign policy, international stability, international control regimes और human-rights considerations जैसे पहलू शामिल हैं।
इसका अर्थ यह है कि Israeli-origin defense और certain cyber technologies के international exports पूरी तरह unrestricted commercial software sales की तरह नहीं देखे जाते।
हालांकि, किसी विशेष spyware deal को सीधे किसी diplomatic bargain या intelligence exchange का हिस्सा बताने के लिए अलग और ठोस evidence आवश्यक है। इसलिए ऐसे दावों को प्रमाण के बिना तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
Pegasus विवाद इतना बड़ा क्यों हुआ?
Pegasus विवाद का एक बड़ा कारण यह रहा कि ऐसी तकनीकें केवल theoretical capability नहीं रहीं। विभिन्न देशों में पत्रकारों, राजनेताओं, विपक्षी व्यक्तियों, वकीलों, diplomats और civil-society actors को spyware targeting से जोड़ने वाले मामले सामने आए।
European Parliament की PEGA inquiry ने commercial spyware के इस्तेमाल और उसके संभावित दुरुपयोग की विस्तृत जांच की। Parliament के अनुसार spyware का इस्तेमाल कुछ मामलों में political opposition, journalists और civil society को monitor, intimidate या discredit करने के लिए किया गया।
European Parliament के research material में यह भी दर्ज है कि Pegasus और equivalent spyware से जुड़े मामलों में EU तथा non-EU देशों के सरकारी actors पर journalists, politicians, officials, lawyers और civil-society actors को target करने के आरोप और findings सामने आए।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: किसी व्यक्ति का फोन target list में होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उसका फोन सफलतापूर्वक संक्रमित भी हुआ था। अलग-अलग मामलों में targeting, attempted infection और confirmed infection के बीच अंतर होता है।
Commercial spyware और लोकतांत्रिक व्यवस्था
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या अत्याधुनिक surveillance technology का इस्तेमाल केवल terrorism और serious crime जैसे गंभीर खतरों से निपटने तक सीमित रह सकता है?
सरकारें आमतौर पर national security और law enforcement की जरूरतों को spyware के इस्तेमाल का आधार बताती हैं। दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और investigative researchers ने चेतावनी दी है कि पर्याप्त judicial oversight और transparency के अभाव में यही technology journalists, political opponents और civil society के विरुद्ध इस्तेमाल हो सकती है।
European Parliament ने spyware के दुरुपयोग को लेकर कई EU member states के संदर्भ में चिंता व्यक्त की और अधिक मजबूत safeguards तथा accountability की आवश्यकता पर जोर दिया।
Apple और Google जैसे technology platforms की प्रतिक्रिया
Commercial spyware के खतरे ने smartphone manufacturers को भी अपने security models मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है।
Apple ने Lockdown Mode पेश किया है, जिसे विशेष रूप से उन लोगों के लिए बनाया गया है जिन्हें highly sophisticated cyberattacks, including mercenary spyware, का असामान्य रूप से अधिक जोखिम हो सकता है। यह feature कई सामान्य device functions को सीमित करके attack surface कम करने का प्रयास करता है।
Google ने भी targeted attacks के विरुद्ध Advanced Protection जैसी सुरक्षा सुविधाओं को मजबूत किया है।
लेकिन cybersecurity की दौड़ यहीं खत्म नहीं होती। जैसे-जैसे operating systems और applications अपनी सुरक्षा मजबूत करते हैं, sophisticated attackers नए vulnerabilities, नए exploit chains और नए attack surfaces की तलाश करते रहते हैं।
Pegasus प्रकरण ने दुनिया को यह दिखाया है कि साइबर हथियारों और commercial surveillance technology के बीच की रेखा कितनी तेजी से धुंधली हो रही है।
एक तरफ सरकारों के पास आतंकवाद, गंभीर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े खतरों की जांच के लिए तकनीकी साधनों की जरूरत है। दूसरी तरफ, वही technology यदि बिना पर्याप्त कानूनी निगरानी, न्यायिक नियंत्रण और पारदर्शिता के इस्तेमाल की जाए, तो व्यक्तिगत गोपनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
इसलिए असली प्रश्न केवल यह नहीं है कि “क्या किसी फोन को चुपचाप हैक किया जा सकता है?”
असली प्रश्न यह है कि ऐसी क्षमता किसके पास होनी चाहिए, किन परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल वैध माना जाए, किस स्तर की न्यायिक अनुमति आवश्यक हो और दुरुपयोग होने पर जवाबदेही किसकी हो।
Pegasus की कहानी इसी बड़े वैश्विक प्रश्न का एक महत्वपूर्ण अध्याय है—जहां technology, national security, privacy और human rights एक-दूसरे से सीधे टकराते दिखाई देते हैं।