न्याय की आँखों पर पट्टी? वडोदरा हिट-एंड-रन मामले में बेल मिलने से उठे सवाल – क्या कानून सबके लिए समान है?

 मार्च २०२५ की होली की रात, गुजरात के वडोदरा शहर के कारेलीबाग इलाके में एक भयानक सड़क हादसा हुआ। एक तेज रफ्तार Volkswagen Virtus कार ने तीन दोपहिया वाहनों को टक्कर मार दी। इस हादसे में एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि सात अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। कुल आठ लोग प्रभावित हुए। आरोपी रक्षित चौरसिया (२३ वर्षीय एमएसयू लॉ स्टूडेंट) को पुलिस ने घटनास्थल से ही गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस जांच और फॉरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी नशे (कैनबिस यानी THC और codeine) के प्रभाव में था और कार की रफ्तार काफी अधिक थी। चार्जशीट में IPC की धारा १०५ (culpable homicide not amounting to murder) और NDPS Act की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। घटना के बाद वायरल हुए वीडियो में आरोपी को कार से उतरते हुए "Another round, another round" चिल्लाते सुना गया – जो समाज में गुस्सा पैदा करने वाला था।

कोर्ट का फैसला और वजहें

दिसंबर २०२५ में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस एन एस करियल ने आरोपी को सशर्त जमानत दे दी। जमानत की मुख्य शर्तें:

१ लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड

गवाहों से संपर्क न करना

दोबारा अपराध न करना

ट्रायल में सहयोग करना

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी युवा (२३ वर्ष) है, कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है (कुछ छोटे मामलों को छोड़कर), और वह नौ महीने से जेल में था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत का मतलब दोषमुक्ति नहीं है – ट्रायल जारी रहेगा और सबूतों के आधार पर फैसला होगा। सेशन कोर्ट ने पहले जमानत खारिज की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे मंजूर किया।

मृतक महिला हेमाली पटेल की उम्र ३७ वर्ष थी। उनके पति पुरव पटेल ने मीडिया से कहा – "यह फैसला हमें बहुत दुखी कर रहा है। मेरी पत्नी की मौत हुई, वह नशे में था, तेज रफ्तार से गाड़ी चला रहा था। हम इस फैसले को स्वीकार नहीं करते।" पीड़ित परिवार अब जमानत को चुनौती देने के बारे में सोच रहा है। कई घायलों ने भी गहरी पीड़ा जताई है कि न्याय में देरी और ऐसे फैसले उन्हें और तोड़ देते हैं।

यह मामला सिर्फ एक हादसा नहीं – यह व्यवस्था का आईना है सड़क हादसों में मौत और घायल होने के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या सजा और जमानत के मानदंड सबके लिए एक जैसे हैं?युवा होने, छात्र होने या कोई पुराना रिकॉर्ड न होने जैसी वजहों से जमानत मिलना – क्या यह न्याय है या विशेषाधिकार?

नशे में वाहन चलाना एक गंभीर अपराध है। NDPS Act और Motor Vehicles Act के तहत सख्त सजा का प्रावधान है, फिर भी जमानत मिल जाती है

यह वक्त है कि समाज और कानून मिलकर सड़क सुरक्षा, नशे के खिलाफ जागरूकता और न्याय में पारदर्शिता पर ध्यान दें। पीड़ितों को तुरंत न्याय और सहायता मिलनी चाहिए। आरोपी को भी निष्पक्ष ट्रायल का हक है, लेकिन पीड़ित परिवारों की आवाज दबनी नहीं चाहिए।

कानून अंधा नहीं होना चाहिए – उसे सबके लिए समान रूप से लागू होना चाहिए। यह मामला हमें याद दिलाता है कि सच्चा क्रांति तब आएगी जब न्याय व्यवस्था में विश्वास बहाल होगा।

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